Saturday, January 22, 2022
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डॉक्यूमेंट्री “खलल” : शिकायते आधी आबादी से भी है

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नारी विमर्श पर जब भी बात होती है तो पितृसत्तात्मक समाज की भूमिका पर सवाल उठते है लेकिन डॉक्यूमेंट्री “खलल” इस बात पर भी चर्चा करती है कि सिर्फ पितृ सत्तात्मक समाज ही नही महिलाएं भी कई बार महिलाओं की परेशानी का सबब बन जाती है।

खलल डॉक्यूमेंट्री बनाने वाली बिंदु रोमी गुर्जर हरियाणा से है । उसी हरियाणा से जो लड़कियों की हत्या करने के लिए बदनाम है। कभी बेटे की चाह में भ्रूण हत्या , कभी दहेज तो कभी सम्मान के नाम पर हॉरर किलिंग।

पूरे भारत मे सबसे कम लिंगानुपात दर्ज इसी राज्य में होता है। वही बदनाम हरियाणा अब नई कहानी लिख रहा है।

हरियाणा के मेडलों पर बहुत लिखा जा चुका , फिल्में बनाई जा चुकी । संस्कृति के नाम पर चलने वाली रागनियां मॉडर्न गानों में बदल चुकी है। हरियाणा की पहचान अब सिर्फ दूध दही का खाना और खेल खिलाड़ियों तक सीमित नही रही है। हर क्षेत्र में हरियाणा के युवा आगे बढ़ रहे है । तो ऐसे में फ़िल्म मेकिंग से अछूते क्यों रहे ?

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डॉक्यूमेंट्री खलल का पोस्टर

फ़िल्म के पोस्टर में महिला के पैर को एक बेड़ीनुमा बेल्ट से एक हाथ ने जकड़ा हुआ है। ध्यान से देखेंगे तो हाथ मे चूड़ियां है और जकड़ने वाला हाथ भी महिला का है । विषय आप समझ चुके होंगे ।

कैसे आया आइडिया

बिंदु रोमी गुर्जर (Bindu Romi Gurjar) इंडिपेंडेंट डॉक्यूमेंट्री फ़िल्म मेकर है । इससे पहले 2020 में महिला दिवस पर पर्दा प्रथा विषय पर डॉक्यूमेंट्री “धुंधला सा” बना चुकी है जिसने कई पुरस्कार भी जीतें । फ़िल्म को खजुराहों फ़िल्म फेस्टिवल के लिए सेलेक्ट किया गया और पुरस्कार भी जीता।

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बिंदु रोमी गुर्जर

अब बिंदु उनकी दोस्त सौम्या राठी और अक्षिता विकल ने मिलकर “खलल” डॉक्यूमेंट्री का निर्माण किया है।

ऐसे समय मे जब महिला शिक्षा , उनके अधिकार और सुरक्षा एक बड़ा मुद्दा है तब भी महिलाओं द्वारा महिलाओं की तरक्की में खलल डाला जाता है। बस “खलल ” इसी पर बात करती है ,  बिंदु गुर्जर बताती है।

बिंदु रोमी गुर्जर , इंडिपेंडेंट फ़िल्म मेकर

सौम्या राठी मानव रचना यूनिवर्सिटी में जर्नलिज्म एंड मास कम्युनिकेशन की छात्रा है । और खलल डाक्यूमेंट्री टीम का हिस्सा है ।

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डॉक्यूमेंट्री फ़िल्म “खलल” की टीम

सौम्या बताती है – हमने कई महिलाओं से बात की जो अपने अपने क्षेत्रों में अच्छा कर रही है । उन्होंने हमारे साथ अपने अनुभव बांटे ।

हम हर प्लेटफार्म पर फेमिनिज्म,बराबरी और महिला अधिकारों की बात करते हैं पर इन महिलाओं ने बताया कि कैसे उन्हें दूसरी महिलाओं से ही सहयोग नहीं मिला। जब तक एक नारी ही सहयोग नहीं करेगी तब तक समाज में बराबरी और वह सब जिसके लिए हम संघर्ष करते आए हैं वह मुमकिन नहीं है। हम पहले से ही समाज से एक लड़ाई लड़ते आ रहे हैं ऐसे में अगर एक दूसरे को नीचे लाने वाले भी हम ही होंगे तो फिर हम यह लड़ाई कभी नहीं जीत पाएंगे।

सौम्या राठी , स्टूडेंट , जर्नलिज्म एंड मास कम्युनिकेशन


मुझे इस डॉक्यूमेंट्री खलल में काम करके बहुत कुछ सीखने को मिला।
मैं कभी भी किसी दूसरी नारी के लिए खलल नहीं बनूंगी और हमेशा उन्हें सहयोग करूंगी और उनका सम्मान करूंगी।
“मैं नारी नारी का सम्मान करूंगी ।”

कंडिशनिंग भी जिम्मेदार

ऐसी परिस्थितियों में जब स्त्री ही स्त्री के खिलाफ दिखाई दे तो अमूमन कह दिया जाता है कि औरत ही औरत की दुश्मन है। लेकिन यहाँ यह याद रखना होगा कि ऐसी महिलाएं भी उसी सामाजिक परिस्थितियों की उपज है जो परिस्थिति समाज ने पिछले हज़ारों सालों से महिला के लिए उत्पन्न की है। प्राकृतिक रूप से स्त्री की दुश्मन नही हो सकती । स्त्री क्या वह किसी की भी दुश्मन नही हो सकती क्योंकि प्रकृति ने स्त्री को जिन गुणों से भरपूर बनाया है उसमे दया और प्रेम कूट कूट कर भरा है।

फिर ऐसा क्या है जो स्त्री ही स्त्री की दुश्मन हो जाती है ? महिलाओं के प्रति होने वाले अपराधों में महिलाओं की संलिप्तता अब हैरान नही करती । चाहे वो दहेज हत्या हो ,शोषण हो चाहे सम्मान के नाम पर हॉरर किलिंग ।

समाजशास्त्री इस बारे में कहते है – इसके लिए कंडिशिंनिंग जिम्मेदार है। अभी जिस समाज मे हम रहते है उसमे महिलाओं की जिंदगी पुरुषों के आधिपत्य में ही गुजरती है । बचपन मे पिता ,युवावस्था में भाई/पति और बुढ़ापे में बेटे पर निर्भरता उसके खुद के निर्णयों को प्रभावित करती है।

बस यही वजह है कि वो महिलाओं की सशक्त पैरवी करने के बजाय पुरूषो के अनुरूप सोचने लगती है। और कई बार महिलाओं के प्रति अपराधों तक मे सम्मलित हो जाती है। बचपन से उसकी कंडिशिंनिंग इस तरह से होती है कि उस पर पितृसत्तात्मक व्यवस्था का प्रभाव साफ दिखाई देता है।

अच्छी औरत , बुरी औरत

धारणाओं का खेल बड़ा खतरनाक है । जब कोई महिला महिला विरोधी दिखे तो ध्यान दीजिये कि यह महिला का स्वयं का निर्णय है या महिला धारणाओं को ढ़ो रही है। समाज ने महिलाओं की कंडिशिंनिंग इस तरह कर दी है कि महिलाएं भी अच्छी औरत,बुरी औरत की परिभाषा में फंस गई है ।

अच्छी औरत की परिभाषा पितृसत्तात्मक समाज के हिसाब से वही है जो उनके अनुरूप व्यवहार करें। व्यवस्था पर सवाल उठाना उसे बुरी औरत में तब्दील न कर दे इस वजह से भी महिला महिला को सपोर्ट नही करती ।

डॉक्यूमेंट्री “खलल” का लिंक

Sunil Nagar
ब्लॉगर एवं मानवाधिकार कार्यकर्ता ।
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