जिन्दगी से निराश है तो रविचंद भाई से मिलिए !

कहते हैं जिंदगी की सबसे अच्छी कीमत वही लगा सकता है, जो रोज मरता हो। जब भी मेरा कोई दोस्त, विद्यार्थी या कोई भी उदासी, निराशा, नाकामी और मरने की बातें करता है तो हँसी आ जाती है। जीवन की परीक्षाओं में अक्सर सफलता के मैसेज आते रहते हैं इधर कुछ दिनों से उदासियों के […]

असित कुमार मिश्र , लेखक क्लब , कहानी , हिन्दी कहानिया ,

वोट फाॅर दुलारी भौजी … (कहानी) – असित कुमार मिश्र की कलम से

वोट फाॅर दुलारी भौजी … (कहानी) कोईरी टोला की दुलारी भौजी ने बीडीसी का पर्चा भर दिया है। पूरा गाँव दुलारी को भौजी ही कहता है। और गांव के बड़े – बूढ़े ही नहीं, खुद भगवान जी भी दुलारी भौजी के साथ मजाक करते हैं। भौजी की कहानी में रहस्य, रोमांच, करुणा, हास्य सब है। […]

याद रखिएगा कि किसी भी भाषा की कब्र पर दूसरी भाषा नहीं जन्मती !

कई दिनों से भोजपुरी और हिंदी में लड़ाई चल रही है। सुश्री भोजपुरी जी का कहना है कि मेरे पास मेरा साहित्य मेरे लोकधर्म मेरे लेखक विचारक सब हैं सबसे ज्यादा बोली जाने वाली बोली / भाषा मैं ही हूँ तो मुझे संविधान की आठवीं अनुसूची में शामिल किया जाए। श्रीमती हिंदी जी का कथन […]

बाएँ बाजू पर खसरे की सूई का निशान आपके युद्ध का पहला मैडल है !

पार्थ! युद्धाय कृतनिश्चय: …. शुकुल सर का नाम सुने हैं आप! क्या कहा – नहीं! तब बलिया को अभी जाने ही नहीं आप।बलिया के ही हैं शुकुल सर। शुकुल सर हैं तो संस्कृत है, शुकुल सर हैं तो शांति हैं, शुकुल सर हैं तभी नैतिकता, आदर्श, विश्वबंधुत्व जैसे शब्द, शब्दकोश में जीवित हैं। बूझ गए […]

भारत को हजारों विकलांग स्वीकार हैं… लेकिन नपुंसक एक भी नहीं ! पढ़िए असित कुमार मिश्र का आलेख !

उरी में हमारे जवानों की शहादत के बाद से ही युद्ध के पक्ष – विपक्ष में काफ़ी कुछ लिखा गया और लिखा जाएगा।कुछ लोग तो बाकायदे युद्ध की विभीषिका से डराने लगे थे। कुछ तो यह भी बता रहे थे कि हमारे पास हथियार और संसाधनों की कमी है। कुछ विकासवाद का रोना भी रो […]

एक मौका तो उसे भी मिलना चाहिए था ? – असित कुमार मिश्र की कलम से

ये रहा रियो वाला मैडल…. हफ्ते भर से रियो में मैडल की तलाश जारी है। मुझसे भी एक दो मित्रों ने पूछा कि असित भाई रियो वाला मैडलवा कहाँ है? देखिए! खेलों की बहुत समझ नहीं है मेरी, क्योंकि बचपन में मुझे खेलता देख कर बाबूजी दूर से ही गरियाने लगते – खाली खेलऽ ससुर, […]

“खाट पर चर्चा” – कब तक चलेगा यह मुफ्त का खेल ??

ढाई आखर मुफ़्त के… इश्क़ भी ढ़ाई आखर का होता है, और मुफ्त भी ढाई आखर का। लेकिन जबसे लोगों ने दिल को ‘प्रियतम का घर’ के बजाए ‘आवास विकास कालोनी’ समझ लिया, तबसे मुफ़्त के नाम पर भीड़ ज्यादा जुटती है और इश्क़ के नसीब में वही हिज्रे अज़ाब। अब अफसानानिगार भी हुस्नपरस्ती के […]