रामगोपाल वर्मा ने बड़ी बदसूरती से अपनी मन की कुंठा को एक बेटी के मुँह से कहलवाया है

फ़िल्म डायरेक्टर  राम गोपाल वर्मा ने महिला दिवस के उपलक्ष्य में कई ट्वीट किए जिसमें से एक ये था, “मैं चाहता हूँ की दुनिया की हर महिला मर्दों को सनी लीओनी की तरह ख़ुशी दे।”

ऐसे बेहूदा स्टेट्मेंट पर बवाल भी हुआ था नपे भी थे। अब सफ़ाई देने के लिए उन्होंने एक “बेहद प्रगतिशील” शॉर्ट फ़िल्म बना डाली है ” मेरी बेटी सनी लीओनी बनना चाहती है”।
इसमें एक लड़की सनी लीओनी बनना चाहती है और उसके लिए उसने अपने माँ बाप को जो दलीलें और तर्क दिए हैं वो निहायत ही वाहियात और बचकाने हैं जो ख़ुद वर्मा की सोच है बेशक,पुरुष अपनी घटिया मानसिकता को कार्यन्वित करने का माध्यम हमेशा स्त्री को बनाता है। कोई क्या है और क्या बनना चाहता है ये बिलकुल अलग मामला है पसंद- नापसंद और कई बार परिस्थितियाँ भी ज़िम्मेदार होती हैं लेकिन इस 11 मिनट की फ़िल्म से ये सोच स्थापित की गई है की एक महिला सिर्फ़ हाउस वाइफ़, माँ,दादी, नानी,बहन, बेटी बन सकती है या पॉर्न ऐक्ट्रेस! एक महिला की सबसे बड़ी ताक़त उसकी “सेक्शूअल पॉवर” है और यही उसकी सबसे बड़ी “स्पेशीऐलिटी”!, एक आदमी से शादी करके उसे एक छोटा सा घर और दो वक़्त की रोटी नसीब होती है तो क्यूँ न वो अपनी सबसे बड़ी “स्पेशीऐलिटी” को बेचकर पैसे कमाए? आख़िर सब लोग कुछ न कुछ बेच ही रहे हैं हम ही बाज़ार हैं और हम ही उपभोक्ता।

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राम गोपाल वर्मा ने बड़ी बदसूरती से अपनी मन की कुंठा को एक बेटी के मुँह से कहलवाया है… दलीलें सुनिए,

“मेरी सेक्शूऐलिटी मेरी “अमानत” है, मेरी “पॉवर” है, मैं उसे “शान” से “इस्तेमाल” करना चाहती हूँ। मेरी बॉडी मेरी प्रॉपर्टी है और मैं उसका पूरा “फ़ायदा” उठाना चाहती हूँ।

माँ कहती है, ” तुझे औरत में सिर्फ़ सेक्स नज़र आता है?” उम्मीद जगती है आगे कुछ बढ़ियाँ बोलेगी लेकिन वो पूछती है, “माँ,दादी,नानी, बहन, बेटी ये सब नहीं दिखाई देते तुझे?”
वर्मा जी वही “क्रीएटिव” ऐश ट्रे यूज़र वाली मानसिकता के हैं, जिनके घर में या तो माँ,बहन, बीवी, बेटी होती है या शराब,सिगरेट के साथ “ख़ुशी” देने के लिए बिछी “एम्पावर्ड औरत” सॉरी “सेक्शूअल स्पेशलिस्ट एम्पावर्ड वुमन”!

लास्ट आते आते वर्मा जी मज़ेदार हो गए हैं, धार्मिक ऐंगल भी रखा है।बेटी के मुँह से वर्मा जी कहते हैं, “एक औरत की वैल्यू सिर्फ़ और सिर्फ़ उसकी सुंदरता और सेक्स अपील है। सारी जंगे औरत की सुंदरता के लिए लड़ी गईं हैं। धर्म में भी लिखा है अगर अच्छे करम करोगे तो रम्भा,उर्वशी, मेनका मिलेंगी!!

इसीलिए भगवान ने भी दादी नानी का नहीं बल्कि एक ख़ूबसूरत लड़की का “”ऑफ़र”” दे रखा है।”
ये सब मनगढ़ंत नहीं डाइयलोग हैं भाई! ख़ूबसूरती लड़की एक ऑफ़र है! उसे भगवान ने दिया है, नेताजी ठीक कहते हैं तभी तो लड़कों से “ग़लती”हो जाती है।
ऐसी लिज़लिजे सोच वाले ही “गटका ले साइयाँ एलकोहल” जैसे गाने बनाते हैं और वो हिट होते हैं। इसके पीछे की सोच पर कोई ध्यान नहीं देता.. वही सेक्शूअली,स्पेशलिस्ट, ऑफ़र्ड, “एम्पावर्ड” वुमन ऑल्वेज़ रेडी एंड अवेलबल फ़ॉर मेन!

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सोसाइटी जब आगे बढ़ रही होती है तो इस जैसी मानसिकता के लोग उसे चालाकी से प्रगतिशीलता का नाम देकर बहुत ही ख़तरनाक दिशा लेकिन अपने फ़ायदे वाली दिशा की तरफ़ मोड़ देते हैं।औरतें इस दुनिया में आयी ही मर्दों को ख़ुश करने के लिए हैं, उनका और कोई काम नहीं। न वो मेहनत कर सकती हैं न दिमाग़ लगा सकती हैं!!
मेरे एक दोस्त ने हाल ही में बताया की कैसे मंदी के दिनों में सिगरेट पीना महिलाओं के लिए बराबरी और हक़ का मामला बना दिए जाने के बाद उस कम्पनी ने करोड़ों के वारे न्यारे किए। वैसे ही जब लड़कियाँ हर क्षेत्र में मज़बूती से आगे बढ़ रहीं तो उन्हें ये बता दो की तुम्हारे पास ईज़ीयस्ट वे ऑफ़ सक्सेस की चाभी है और यही तुम्हारी एकमात्र स्पेशीऐलिटी!

इतना गन्ध फैलाने के बाद हिम्मत देखिए लास्ट में ये क्वोट करते हैं राम गोपाल वर्मा,
“I sincerely believe women empowerment should have no discrimination. Her power should be her choice.”
Round of applause for Mr. Verma.

– प्रीति कुसुम 

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