कश्मीर की आवाज के नाम पर पाकिस्तान की असली रणनीति !

तस्वीर साभार -google
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पाकिस्तान की असली रणनीति ।

पाकिस्तान से हुई पिछली लड़ाइयों के बारे में आप को पता होगा तो आप पाएंगे कि भारत के हर सीमावर्ती राज्य में, जहां युद्ध हुआ वहाँ स्थानिक जनता का बड़ा समर्थन था। कश्मीर में भी था ।

आज आप देखेंगे तो पाकिस्तान ने एक निर्धारित नीति के तहत इस समर्थन की नींव खोदने का बड़ा काम किया है । अगर कश्मीर में देखें तो वहाँ सब से कच्ची कड़ी थी उसकी टूरिज़म आधारित अर्थव्यवस्था । ऐसी अर्थव्यवस्था होना बहुत खतरनाक है । जरा सी भी बात पर टूरिस्ट्स आना बंद हो जाते हैं, उनकी वापसी आसान नहीं होती ।

बर्ड फ्लू की खबर थी या अफवाह, लाखों मुर्गियाँ नष्ट की गई चाइना, सिंगापुर, विएतनाम, हाँग काँग और उस पट्टे के कई देशों में । बहुत नुकसान हुआ उन्हें मार कर । नष्ट की गई, मार कर खाई नहीं गई । लेकिन किसी वामी ने यह नहीं कहा कि उन्हें गरीबों में बांटते तो वे भी पेट भर चिकन खा पाते । SARS याद हैं? चाइना ने पहले तो खबर दबाने की ही कोशिश की थी, बाद में जब दबा न सके तो ज़ोर शोर से कहानियाँ और खबरें फैला दी कि SARS का किस तरह मुक़ाबला किया गया है और उस पर नियंत्रण पाया गया है और चाइना आप के लिए सेफ है ।

यह जरा सा विषयांतर इसलिए जरूरी था ताकि आप समझें कि टूरिज़म को लेकर अन्य देश कितने सतर्क और सजग रहते हैं । अब आप को पाकिस्तानी सोच समझ में आने लगी होगी । धमाके कर के टूरिस्ट भगा दिये । अपहरण कांड किए, लोगों को कत्ल किया और सब को कश्मीर की जनता की आवाज का जामा पहना दिया ।

जब पूरी अर्थव्यवस्था टूरिज़्म पर ही चलती थी तो जाहिर है, चरमरा गयी । ऐसे में लोगों में असंतोष फैलना बहुत आसान है । फैला । फैलाया भी गया । उसका निराकरण करना तत्कालीन फारुख अब्दुल्ला सरकार के बस की बात नहीं थी, लेकिन केंद्र से मदद लेकर सही तरह से समस्या को सुलझाने के बजाय कश्मीरियत की ढपली बजाकर अपनी सल्तनत बचाना उन्हें अधिक सही लगा । वे जानते थे कश्मीर का सामरिक महत्व, उन्हें पता था भारत किसी भी कीमत पर कश्मीर हाथ से जाने नहीं देगा। अब्जों रुपये कीमत वसूल ली, और 370 की दुहाई दे दे कर मामला सुलझाने भी नहीं दिया । जब पानी सर से ऊपर हो गया तभी सेना को जाना ही पड़ा ।

लेकिन सेना का काम बेकाबू परिस्थिति को जल्द से जल्द काबू में लाना होता है और उसके लिए निर्ममता से अपना काम करना पड़ता है । यहाँ हालात ये थे बरसों से बेरोजगार और कम शिक्षित प्रजा के सामने रोजगार के अवसर ही कम थे और ऊपर से यही कहा जा रहा था कि तुमसे मुसलमान होने के कारण भेदभाव किया जा रहा है । केंद्र से मिलती मदद से आम कश्मीरी की जिंदगी संभल नहीं पायी क्योंकि उसतक वो मदद पहुंची ही कहाँ ? सरकारी अधिकारियों के बारे में कहानियाँ अतिरंजित होती होंगी लेकिन बिलकुल निराधार भी तो नहीं होती ।

ऐसे में बेरोजगारों का मददगार पाकिस्तान हुआ । उम्मतवाला भाईचारा । तबतक सब यह भूल गए कि उन्हें बेरोजगार करनेवाला भी पाकिस्तान ही था, अब केवल उसके हाथ में पकड़ी नोट दिख रही थी । ‘अस्सी गच्ची पाकिस्तान’ चिल्लाने का ज़ोर इन्हें नोटों ने दिया ।

यहाँ स्थित्यंतर होते रहे लेकिन कश्मीरी राजनेताओं के लिए जलता काश्मीर ही मुद्दा था टिके रहने का, समस्या सुलझ जाये तो उनका space खत्म । कश्मीरी पंडितों की बात करना दक़ियानूसी थी, हिन्दू वो भी पंडित और मुसलमानों के द्वारा पीड़ित यह बात लश्कर ए मीडिया को स्वीकार्य नहीं थी, मुद्दा दबाया गया । पंडित वर्ग सभ्य था, दंगों पर उतर आनेवाला नहीं था इसलिए संज्ञान लेना ही छोड़ दिया गया।

दस साल में समाज की एक नयी पीढ़ी का उदय होता है । चार पीढ़िया बीत गयी बेरोजगारी, असुरक्षा और भारतद्वेष को लेकर । कितने बचे होंगे लोग वहाँ जो इस खेल के सजग साक्षी होंगे और उनमें से भी कितने यह बोलने की हिम्मत करेंगे कि अब्दुल्ला ने कश्मीर को भारत के लिए बेगाना कर दिया ?

पाकिस्तान की इस नीति आप समझ गए होंगे । वहाँ पंजाब और राजस्थान में खलिस्तान (पंजाब) और अब ड्रग्स फैलाकर वहाँ भी जनसमर्थन को खोखला करने का काम किया है । यह सब होने देने और फूलनेफलने के लिए जो जिम्मेदार हैं उन्हें धर्म, जाति, पंथ और पक्षनिरपेक्ष भाव से……… बाकी आप समझदार हैं ।

-आनंद राजाध्यक्ष

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आनंद राजाध्यक्ष जी मुंबई से है सोशल मीडिया के चर्चित लेखक है ! हजारो लोग इन्हें फोलो करते है ! राष्ट्रवादी विचारधारा के इनके लेख काफी प्रभावपूर्ण होते है !

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