फ़ेसबुक को सुशोभित सक्तावत से डर क्‍यों लगता है ?

साथियो, मेरा नाम सुशोभित सक्‍तावत है और मैं नफ़रत का सौदागर नहीं हूं !

मेरा केवल एक ही दोष है : बेईमानी के बियाबान में जितनी घास नहीं उगती, उससे ज़्यादह सवाल मेरे ज़ेहन में उगते हैं!

लेकिन यही तो मुसीबत है कि सवालों के जवाब नहीं हैं, उल्टे सवाल पर सवाल हैं!

“सवाल पर सवाल हैं”, ये किसने कहा था, याद आता है?

जबकि लीजिए, मैं डर से थर थर कांप नहीं रहा, उल्टे मुस्करा रहा हूँ!

ये मुस्कराहटें आपकी शिकस्त का परचम हैं!

sushobhit saktawat सुशोभित सक्तावत

ठीक अभी मैं अपने आपको किसी “जरायमपेशा” की तरह महसूस कर रहा हूं। जैसे कि जरायमपेशा लोग दंभोक्‍त‍ि से कहते हैं ना कि हम चार बार जेल की सज़ा काट चुके हैं, वैसे ही मैं किंचित विडंबना के भाव से आपको यह बता रहा हूं कि फ़ेसबुक ने मुझे ( सुशोभित सक्तावत ) चौथी बार ब्‍लॉक किया है!

चार बार ब्‍लॉक!

यहीं इसी फ़ेसबुक पर गालियां बकने वाले लुम्‍पेन तत्‍व हैं, यहीं पर भड़काऊ बातें करने वाले जाहिल हैं, यहीं पर औरतों के इनबॉक्‍स में जाकर उन्‍हें तंग करने वाले लम्‍पट हैं, यहीं पर बेबुनियाद अफ़वाहों को शेयर कर एक प्रहसनमूलक प्रवाद-पर्व रचने वाले अधीर भी हैं, फ़ेसबुक इनमें से किसी को ब्‍लॉक नहीं करता। लेकिन फ़ेसबुक ने सुशोभित सक्तावत को चार-चार बार ब्‍लॉक किया है!

मुझे नहीं मालूम, ब्‍लॉकिंग की पद्धति क्‍या है। क्‍योंकि फ़ेसबुक कभी आपसे प्रतिप्रश्‍न नहीं करता। आपका पक्ष जानने का प्रयास नहीं करता। वह सीधे आपको सूचित करता है कि आपको ब्‍लॉक कर दिया गया है। यह मध्‍ययुगीन प्रणाली है। केवल मास-रिपोर्टिंग लॉबी के आपके विरुद्ध सक्रिय होने भर की आवश्‍यकता है। और मेरे विरुद्ध तो संज्ञाशून्‍यों, हतप्रज्ञों, हतवीर्यों और किंकर्तव्‍यविमूढ़ों की एक समूची जनमैदिनी सक्रिय है। अपने आपमें अठारह अक्षौहिणी!

sushobhit saktawat सुशोभित सक्तावत

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अभिव्‍यक्‍त‍ि की स्‍वतंत्रता को मैं निर्बाध और पूर्ण नहीं मानता, इसके बावजूद कि मैंने अपने वक्‍तव्‍य में मर्यादाएं कभी नहीं लांघीं। फिर भी इसे तर्कणा के एक प्रस्‍थान-बिंदु की तरह उपयोग करने में मुझे कोई हर्ज नहीं है।

मसलन, यही कि, हाल ही में एक कथित दलित चिंतक को फ़ेसबुक द्वारा ब्‍लॉक किए जाने के बाद “फ्रीडम ऑफ़ एक्‍सप्रेशन” पर सत्‍तातंत्र के “आपातकालीन” प्रहार के संबंध में अनेक तक़रीरें उग आई थीं। मैं उन तमाम लोगों से पूछना चाहूंगा कि 30 दिनों के लिए सुशोभित सक्तावत का मुंह बंद करा देने की कोशिशों पर आपके क्‍या विचार हैं?

जहां भी आपको वे दोमुँहे लोग दिखाई दें, उनसे पूछिए कि “वॉट डु यू थिंक अबाउट सुशोभित सक्तावत  ?” अगर आप उसके बारे में नहीं बोल रहे हैं तो क्‍यों नहीं बोल रहे हैं? आप अभिव्‍यक्‍त‍ि की आज़ादी के पैरोकार हैं या अभिव्‍यक्‍त‍ि के एकालाप के? आप फ्री स्‍पीच के निर्बंध प्रवाह के पक्षधर हैं या विचारों की एकतरफ़ा अय्याशियों के? यह आपकी परीक्षा है। और मुझे पूरा विश्‍वास है कि आप अपनी-अपनी परीक्षाओं में पहले ही विफल हो चुके हैं।

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फ़ेसबुक को सुशोभित सक्तावत  से डर क्‍यों लगता है ?

फ़ेसबुक पर विराजमान बुद्धिमत्‍ता के मठाधीश सुशोभित सक्तावत से भयभीत क्‍यों हैं?

आपका ये भय ही आज के वक्‍़त की तस्‍वीर है। आप डरे हुए हैं। और आपके पास जवाब नहीं हैं!

“हेट स्‍पीच” का आरोप मुझ पर लगाया गया है, जिस पर मैं पहले ही विस्‍तार से सफ़ाई दे चुका हूं। इस देश में राजकीय सुरक्षा प्राप्‍त राजनेता अचकन और शेरवानी पहने “हेट स्‍पीच” करते हैं, लेकिन पाबंदी लगाई जाती है उस सुशोभित सक्तावत  पर, जो तर्कों और तथ्‍यों के साथ अपनी बात सधी हुई साधुभाषा में रखता है।

क्‍या मैंने कभी कहा कि अल्‍पसंख्‍यकों का व्‍यापक जनसंहार किया जाए?

क्‍या मैंने कभी कहा कि अल्‍पसंख्‍यकों को देशनिकाला दे दिया जाए या डुबो दिए जाएं अरब सागर में पूरे अठारह करोड़?

क्‍या मैंने कभी यह कहा कि पंद्रह मिनट के लिए पुलिस हटा लीजिए और फिर बहुसंख्‍या का बल देखिए?

क्‍या मैंने कभी “चीर देंगे खीर देंगे” वाली शैली में बात की है?

“हेट स्‍पीच” की परिभाषा क्‍या होती है? सत्‍यभाषण हेट स्‍पीच है या फिर प्रश्‍नाकुलता घृणास्‍पद है?

sushobhit saktawat सुशोभित सक्तावत

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जब मैं कहता हूं कि देश का अल्‍पसंख्‍यक वर्ग आत्‍ममं‍थन की तैयारी दिखाए तो क्‍या यह घृणा का प्रसार है?

जब मैं कहता हूं कि देश का अल्‍पसंख्‍यक वर्ग अपनी मज़हबी किताब के बजाय देश के संविधान में आस्‍था जताए तो क्‍या यह घृणा का प्रसार है?

जब मैं कहता हूं कि देश का अल्‍पसंख्‍यक वर्ग आतंकवाद के विरुद्ध उसी तरह से सड़कों पर उतरकर आए जैसे देश का बहुसंख्‍यक वर्ग असहिष्‍णुता के लिए सड़कों पर उतर आता है तो क्‍या यह घृणा का प्रसार है?

जब मैं कहता हूं कि देश का अल्‍पसंख्‍यक वर्ग अपने भीतर धार्मिक सामाजिक सुधारों का सूत्रपात करे, औरतों को उनके हक़ दे, तालीम को सबसे बढ़कर माने और नागरिकता को धार्मिकता से अधिक महत्‍व दे तो क्‍या यह घृणा का प्रसार है?

जब मैं कहता हूं कि पशुवध की घृणित परंपरा पर रोक लगे तो यह घृणा है या करुणा है?

जिस तरक्‍़क़ीपसंदगी के पैरोकार फ़ैज़ो फ़िराक रहे हैं वो फ़िरकापरस्‍त कब से बन गई, यह पूछना क्या गुनाह है?

sushobhit saktawat सुशोभित सक्तावत

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मेरा अपराध यह है कि मैंने हिंदी साहित्‍य के मठाधीशों से पूछा कि :

आप हिंदू धर्म की बुराइयों का जिस आत्‍मप्रेरणा से प्रतिकार करते हैं उस तरह से इस्‍लाम की बुराइयों का क्‍यों नहीं करते?

आप हिंदू धर्म में उभर रहे चरमपंथ का जिस स्‍वचेतना से प्रतिकार करते हैं उस तरह से इस्‍लामिक आतंकवाद का क्‍यों नहीं करते?

आप पाकिस्‍तान और कश्‍मीर के मज़हबी अलगाववाद का समर्थन क्‍यों करते हैं और उसके बावजूद स्‍वयं को धर्मनिरपेक्ष क्‍यों कहते हैं?

ऐसा क्‍यूं है कि आतंक का धर्म नहीं होता लेकिन आतंक का एक रंग होता है? भगवा आतंक?

शांतिपूर्ण सहअस्‍त‍ित्‍व का दूसरा नाम आंखें मूंदकर बुराइयों पर परदा डालना कब से हो गया? सच को देखना अम्‍नो-चैन की हत्‍या कब से कहलाने लगी?

 

 

sushobhit saktawat सुशोभित सक्तावत

हिंदी साहित्य के एक मठाधीश से जब मैंने इनमें से कुछ सवाल किए तो उन्‍होंने तुनककर कहा : “तुम और तुम जैसे लाखों लोग, दफ़ा हो जाओ!” फ़क ऑफ़!”

मैंने मठाधीश के नाम एक पत्र लिखा, उसका मुझे कोई उत्‍तर नहीं मिला।

“राजा नंगा है”, यह कहने में अक्षम उन मठाधीश के शिष्‍यों ने मुझसे सीधे संवाद करने के बजाय अपनी अपनी वॉल पर मेरे बारे में अनर्गल प्रलाप करना शुरू कर दिया, जिसमें कपोल कल्‍पित झूठ की भरमार!

मैंने फिर फिर उस पर सफ़ाई दी, अपनी वॉल पर भी, उनकी वॉल पर भी, किसी के पास कोई उत्‍तर नहीं था, केवल दुर्भावनाएं थीं, केवल घृणा थी, केवल रोष था कि तुम्‍हारी हिम्‍मत कैसे हुई यह कहने की कि हमारा “राजा नंगा है!”

मैं आप सबसे आग्रह करता हूं कि आप अपनी आंखें खोलकर देख लीजिए : “राजा नंगा है!”

हिंदी साहित्‍य के मठाधीश निर्वस्‍त्र हैं, निर्लज्‍ज हैं और उनके कृपाकांक्षी शिष्‍य उस सुशोभित की आवाज़ को बंद कराने के लिए कमर कसे हुए हैं, जिसकी एक भी बात का उत्‍तर वे नहीं दे सकते हैं!

मैं उन कायरों और कुपढ़ों के गिरोह को ललकारता हूं कि अगर पुरुषार्थ है तो सधे हुए तर्कों से मेरा प्रतिकार करो, अन्‍यथा अपनी नैतिक पराजय स्‍वीकार करो। और बंद करो अभिव्‍यक्‍त‍ि की आज़ादी का यह अरण्‍यरोदन!

मैं अपनी निर्भीक और स्‍वतंत्र बौद्ध‍िक अभिव्‍यक्‍ति और प्रश्‍नाकुलता पर बलात लादे गए इस “अनुशासन-पर्व” की भूरि-भूरि भर्त्‍सना करता हूं!

बौद्ध‍िक पाखंड, अन्‍यायपूर्ण वर्चस्‍व और इकहरी दुर्भावनाओं का समूल नाश हो!

-सुशोभित सक्तावत 

[ पुनश्‍च : कुछ कायरों ने कल सुशोभित सक्तावत  को ब्‍लॉक किए जाने के बाद अपनी वॉल पर “चांडालों” की तरह उत्‍सव मनाया था। उनके लिए बुरी ख़बर। सुशोभित सक्तावतअभी जीवित है। केवल उसका फ़ेसबुक अकाउंट ही ब्‍लॉक हुआ है। अगर बुद्धिबल हो तो आओ और सामना करो।

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