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हमें बेहतर दुनियां बनानी है तो इन सरदारों से हमें सीखना पड़ेगा !

बांग्ला साहिब गयी थी अपने दोस्तों के साथ। पहुँचते ही चप्पल-जूते रखने वाले काउंटर पर पहुँचे। सैकड़ो चप्पल इधर से उधर हो रहे थे और करीब आठ-दस सरदार जी इस काम में लगे हुये थे। मैंने अपनी सैंडिल काउंटर पर रखा ही कि बिल्कुल चुन्नू से हाथों ने इसे दबोच लिया। मेरे मुँह से दर्द भरी आह निकल गयी। बच्चा अपनी छोटी सी पगड़ी समेत काउंटर की ऊँचाई तक नहीं पहुँच पा रहा था इसीलिए उसके हाथों में अपनी नयी सैंडिल देख मैं ज्यादा कॉन्फिडेंट नहीं थी। डर था कि इसने गड़बड़ किया तो इन सैकड़ो जूते-चप्पलों के बीच में अपनी वाली ढूंढने में मेरा आधा दिन निकल जायेगा।

प्रतीकात्मक तस्वीर – साभार गूगल

वह सैंडिल लेकर चल दिया और उसके पीछे-पीछे एक बूढ़े सरदार भी। उन्होंने उसे गोदी उठा कर मेरी सैंडिल ऊपर के खत पर रखवायीं। फिर बच्चा गम्भीर प्रोफेशनल सा चेहरा लेकर मेरी तरफ टोकन बढ़ा दिया। उसके इस सफलता पर सरदार जी ने सिर हिला कर उत्साहवर्धक मुस्कान दिया। मैंने भी थंब्स-अप कर दिया। अब बच्चा दूसरे की जूते  लेने चला तो सरदार जी फिर पीछे चल दिये।

हम जब लंगर खाने पहुँचे तो वहाँ भी काम पर कई छोटे बच्चों को लगाया गया था। कुछ तो मुश्किल से पाँच साल के होंगे पर किसी पैतीस साल के मैनेजर की तरह नजर जमाये थे पूरी व्यवस्था पर। किसी दूसरे छोड़ पर कहीं थाली में चपाती खत्म हुई नहीं कि तुरन्त प्रकट हो जायेंगे अपने नन्हे हाथों में चपाती लिये। या फिर तुरन्त सूचित करेंगे किसी बड़े को।

खाना खत्म होते ही सभी अपनी-अपनी थाली उठाते हैं पर बहुत से सरदार लगे रहेंगे आपके लिये यह काम भी कर देने को। जैसे एक बच्चे ने आकर तुरन्त मेरे दोस्त की थाली लेने की कोशिश की। निठल्ले दोस्त बेचारे को आत्मग्लानि हुयी इतना सेवा देख तो वह और जोर से थाली पकड़ कर बोलने लगा, ” अरे नहीं मैं खुद उठाऊँगा।” बच्चा बोला, “भैया दे दो।”
दोस्त बोला,”अरे नहीं-नहीं।” मैंने अपनी थाली पकड़ा दी बच्चे को ” वेरी गुड” बोलकर। उसकी बाँछे खिल गयी कि वह इतना अच्छा काम कर रहा है।

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फोटो – साभार google

दुनिया के हर धर्म में सेवा की बात की गयी है पर सिख एकमात्र हैं जो consistently इसे कार्यान्वित करते हैं। ये अपनो बच्चों को उपदेशात्मक कहानी पढ़ा कर बात खत्म नहीं करते दुनियाभर के ज्यादातर माता-पिता की तरह। बल्कि इन्होंने एक  रिवॉर्ड सिस्टम (reward system) बनाया है बचपन से ही। वह जूते के काउंटर पर बूढा सरदार या लंगर में काम कर रहे बच्चों का उत्साहवर्धन करते उनके अंकल-आंटियों की मुस्कुराहट ही यह रिवॉर्ड  ( Reward ) है। इन्होंने बच्चों के दिमाग में शुरू में ही डाल दिया है कि वह मदद करेगा तो उसकी तारीफ होगी, लोग उससे खुश होंगे और वह एक अच्छा इंसान बनेगा। ये बचपन की ट्रेनिंग मरते दम तक उसके साथ रहने वाली है।

 

बच्चा हो या बड़ा बिना किसी expectation के इंसान कोई काम नहीं करता। आप कुछ नहीं तो अपनी आत्मिक सन्तुष्टि के लिये किसी की मदद करेंगे। पर यह चीज एक इंसान में बचपन में ही डालनी होगी कि मदद करने पर अच्छा महसूस होता है। इसके लिये भी कंडीशनिंग की जरूरत है। वरना यहाँ हर इंसान रटी-रटाई बात बोलता है, “दुसरो का मदद करके बड़ा बढ़िया फील हुआ।” पर कितने लोग हैं जो ये “बढ़िया फील” बार- बार लेने की कोशिश करते हैं?

नहीं करते क्योंकि ज्यादातर लोगों के लिये मदद करने में परेशानी ज्यादा है और उस काम के लिये recognition कम। मेरा दोस्त एक एक्स्ट्रा मरीज की आउट ऑफ़ वे  जाकर मदद करने के चक्कर में पड़ता है तो रात ग्यारह बजे जाते हैं घर आते-आते। पर उसके बाद उसकी डिपार्टमेंट इस एक्स्ट्रा मेहनत को recognize नहीं करती। ऐसे में इंसान कितने दिन मोटीवेटेड  रहेगा मदद करने के लिये?

हमें बेहतर दुनिया बनानी है तो इन सरदारों से हमें सीखना पड़ेगा ये reward system बनाना। बच्चों को छोटी-छोटी जिम्मेदारियाँ देना। और जब वह एक रैपर भी उठा कर डस्टबिन में डाले तो उनकी पीठ थपथपाना। अगर हमने यह कर लिया तो हम बहुत जल्द ही एक शानदार पीढ़ी का निर्माण करेंगे।
– मेघा मैत्रेय

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मेघा मैत्रेय Author

मेघा मैत्रेय हरियाणा से है और सोशल मीडिया पर काफी एक्टिव रहती है ! राजनीति , समाज और नारी शशक्तिकरण पर जोरदार तरीके से लिखने वाली मेघा स्टूडेंट है !

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