सच यही है कि 2 अरब मुस्ल‍िमों ने आज वैश्व‍िक सभ्यता को “बंधक” बना रखा है।

सभ्यताओं का स्वरूप कभी स्थानीय हुआ करता था, फिर उनकी अंत:क्रियाएं हुईं, नए “कल्चरल पैटर्न्स” उभरे और यह कोई नई ख़बर नहीं है। अगर आज दुनिया का स्वरूप वैश्वीकृत है, अगर सूचना-तकनीक वैश्व‍िक है, अगर आर्थ‍िक तंत्र वैश्विक संवेदों के आधार पर एक-दूसरे से जुड़े हुए हैं तो एक “वैश्व‍िक सभ्यता” की कल्पना क्यों नहीं की जानी चाहिए? और अगर ऐसी किसी वैश्विक सभ्यता की कल्पना की जाती है तो इसमें सबसे बड़ी रुकावट क्या साबित होने वाली है? वे सभ्यताएं ही ना, जो कि विकासक्रम की गति में पिछड़ी हुई हैं? अगर हम सभ्यता को एक रथ मानें तो हमें यह भी मानना होगा कि उसके सभी पहिए समान रूप से चलायमान हों, लेकिन अगर रथ का एक पहिया टूटा हुआ हो तो? तब एक परिष्कृत संरचना होने के बावजूद, देश-काल-परिस्थ‍ितियों के अनुकूलन के बावजूद, वह रथ उस एक टूटे हुए पहिये के कारण आगे नहीं बढ़ पाएगा।

तस्वीर – साभार गूगल

तमाम अंतर्संघर्षों और अंतर्विरोधों के बावजूद अगर एक वैश्विक “कॉस्मोपोलिटन” सभ्यता आज हम देख पाते हैं, तो हमें यह क्यों नहीं पूछना चाहिए कि इस सभ्यता के सभी घटक समान गति से विकास कर रहे हैं या नहीं, और अगर नहीं तो क्यों नहीं?

इस्लाम, जिसके अनुयायियों की संख्या आज दुनिया की कुल आबादी की एक चौथाई है, मानवीय सभ्यता के गतिरथ में वही टूटा हुआ पहिया आज साबित हो रहा है, यह मानने में मुझे कोई दुविधा नहीं है। मेरा यह भी मानना है कि अगर आज इस्लाम में “रिफ़ॉर्म” हुआ होता, अगर इस्लाम एक प्रगतिशील और समावेशी और उदारवादी मज़हब के रूप में विकसित हुआ होता, जिसकी कि कल्पना करना भी कठिन है, तो वैश्विक सभ्यता आज से दो सौ साल आगे की स्थ‍िति में होती। भला लगे या बुरा, सच यही है कि कोई 2 अरब मुस्ल‍िमों ने आज वैश्व‍िक सभ्यता को “बंधक” बना रखा है।

विज्ञान पश्च‍िम में जन्मा। इस्लाम की ही तरह एकेश्वरवादी धर्म ईसाईयत भी था, लेकिन सोलहवीं सदी में उसने लूथर के नेतृत्व में अपने भीतर सुधार किए। “रोमन कैथोलिक” सत्ताओं को चुनौती दी गई, “प्रोटेस्टेंट” रिफ़ॉर्म्स हुए, “चर्च” के वर्चस्व को बेदख़ल किया गया। “प्रबोध” और “संज्ञान” के लिए ईसाईयत ने एक क़ीमत चुकाई है, उसे यह तश्तरी में सजाकर नहीं दिया गया। उन्नीसवीं सदी में रब्बी गेइगर के नेतृत्व में यहूदियों ने और राजा राममोहन रॉय के नेतृत्व में हिंदुओं ने अपने भीतर सुधार किए। सती प्रथा समाप्त हुई, बाल विवाह समाप्त हुआ, पशु‍बलि की बर्बर प्रणाली को लगभग निरस्त कर दिया गया। नतीजा, हमारे सामने बीसवीं सदी के अंत तक एक ऐसी सुधारवादी, प्रगतिशील और उदारवादी विश्व सभ्यता उभरी, जो कि सूचना तकनीक के माध्यम से एक-दूसरे से जुड़ी हुई थी, जो पुनर्जागरण की भावना से उत्प्रेरित थी, जो कॉस्मोपोलिटन थी और एक विश्व-नागरिकता की बात करती थी, जो हर लिहाज़ से वैश्वीकृत थी।

सिवाय इस्लाम के, जो सभ्यता के विकासरथ का हिस्सा बनने को अब भी तैयार नहीं था, और जिसके अनुयायी जहां बहुसंख्या में मौजूद थे, वहां मानवाधिकार के हनन की कोई सीमा ही नहीं थी, और जहां अल्पसंख्या में मौजूद थे, वहां उनका प्रयास रहता था कि एक लोकतांत्र‍िक और धर्मनिरपेक्ष दायरे में भी उनके अपने पर्सनल लॉ और शरीया क़ानून अक्षुण्ण रहें। प्र‍गतिशीलता के प्रति इस्लाम की इस झिझक ने समूची विश्व-सभ्यता को “हाइजैक” कर रखा है और एक “टाइम-वार्प” में “कैप्ट‍िव” बना रखा है।

देखा जाए तो सैम्युअल हटिंग्टन की सभ्यताओं के संघर्ष की जो बहुचर्चित थ्योरी है, वह सभ्यताओं के संघर्ष के बारे में उतनी नहीं है, जितनी कि एक वैश्व‍िक सभ्यता की अनिवार्यता और इस्लाम की वजह से उसमें निर्मित होने वाली रुकावटों के बारे में है।

ये इक्कीसवीं सदी है, इस युग में आकर क्यों नहीं इस्लाम को सलाफ़ियत और वहाबियत के चंगुल से मुक्त हो जाना चाहिए? क्यों नहीं उसे शरीयत को तिलांजलि दे देना चाहिए? क्यों नहीं उसे एक किताब और एक पैग़म्बर और एक ख़ुदा की परिकल्पनाओं से परे देखने की कोशिश करनी चाहिए?

जब दूसरे धर्म अपने में सुधार कर सकते हैं, तो इस्लाम अपने में सुधार क्यों नहीं कर सकता? जब दूसरे मुल्क़ मानवाधिकार को अपना धर्म मान सकते हैं तो इस्लामिक मुल्क़ों में मानवाधिकार की बलि क्यों चढ़ाई जाती रहती है? क्यों इस्लाम के लिए यह सोचना भी लगभग नामुमकिन है कि वह पशुबलि जैसे घृणित कृत्य को त्याग सकता है? क्यों आज के युग में भी व्यभिचार के आरोप में पत्थर मारकर महिलाओं की हत्या कर दी जानी चाहिए और चोरी के आरोप में नौजवानों के हाथ काट डालने चाहिए?

क्यों वैश्व‍िक बौद्ध‍िकता को इस पर चुप्पी साधे रखना चाहिए? उल्टे, क्यों वैश्व‍िक बौद्ध‍िकता को इस्लाम में न्यस्त जड़ता को प्रश्रय देना चाहिए।

islam sushobhit saktawat इस्लाम सुशोभित सक्तावत

मनुष्यता का अगर कोई सुनहरा भविष्य है, तो मेरा मानना है कि उसकी शुरुआत अनिवार्यत: इस्लाम में “रैडिकल रिफ़ॉर्मिस्ट मूवमेंट्स” के साथ ही हो सकती है, अन्यथा नहीं। 7 अरब की आबादी वाली दुनिया में 2 अरब लोगों का एक बड़ा हिस्सा मध्ययुगीन बर्बरताओं और अंधकार में डूबा रहे, शिक्षा और प्रगतिशीलता और वैश्व‍िक सभ्यता को संदेह की दृष्ट‍ि से देखे और उसका प्रतिकार करे और आतंकवाद के संरक्षक के रूप में उसका लगभग समानार्थी बन जाए तो दुनिया को किसी और विनाश की आवश्यकता नहीं है। वह प्रचंड विनाश के बीज अपने में ही लेकर घूम रही है।

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[ चित्र : इंडोनेशिया में एक औरत की सरेआम बेंत से पिटाई। उसका गुनाह : वह एक ऐसे पुरुष के समीप खड़ी थी, जो कि उसका “शौहर” नहीं था। इस्लामिक बहुसंख्या वाले देश आज भी इसी मध्ययुगीन बर्बरता में जी रहे हैं और इस्लामपरस्त लिबरल समुदाय मुंह में दही जमाकर बैठा रहता है, उल्टे इस्लाम में सुधार की हर जायज़ मांग को “इस्लामोफ़ोबिया” कहकर निरस्त कर देता है ]

सुशोभित सक्तावत

(विश्‍व सिनेमा, साहित्‍य, दर्शन और कला के विविध आयामों पर सुशोभित की गहरी रुचि है और पकड़ है। वे नई दुनिया इंदौर में फीचर संपादक के पद पर कार्यरत् हैं।)

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