काश कि वो जोधपुर की मुस्लिम बच्ची भी इतनी ख़ुशनसीब होती.

जोधपुर में हुई घटना पर कल एक मुस्लिम भाई से बात हो रही थी.

जोधपुर में एक “नमाज़ी” ने ख़ुद को हज़रत इब्राहिम समझते हुए इस “मुग़ालते” में अपनी बेटी को जिबह कर दिया था, कि अल्लाहतआला उसको वैसे ही बचा लेंगे, जैसे हज़रत इस्माइल को बचाया था.

लेकिन वैसा हुआ नहीं. पता नहीं, क्या वजह रही होगी. क्योंकि नमाज़ी तो हज़रत इब्राहिम की ही तरह अपनी सबसे प्यारी चीज़ क़ुर्बान कर रहा था.

क़ुर्बानी

 

अगर जोधपुर के वाक़िये के बाद नमाज़ियों के दिलों में इस बात को लेकर शुब्हा बैठ जाए कि हज़रत इब्राहिम वाली दास्तान सच में हुई भी थी या नहीं तो इसके लिए उन्हें दोष नहीं दिया जाना चाहिए.

बहरहाल, उस मुस्लिम भाई से मैंने एक सवाल पूछा–

अगर क़ुरान में लिखा हो कि ईद-उल-अजहा के दिन अपने बच्चे की क़ुर्बानी देना है और नहीं दोगे तो काफ़िर कहलाओगे तो तुम अपने बच्चे की क़ुर्बानी दोगे या नहीं? हां या ना? क्योंकि अगर वेदों में लिखा है कि यज्ञ में बच्चे की बलि या क़ुर्बानी देना चाहिए तो मैं तो ऐसा करने से साफ़ इनकार करूंगा, भले ही वेद-विरुद्ध कहलाऊं.

भाई ने इस सवाल से बचने की कोशिश की, लेकिन जब मैंने फिर अपना सवाल दोहराया तो भाई ने कहा–

“नहीं देंगे बच्चे की क़ुर्बानी!”

यह “इक़बालिया बयान” कल की तारीख़ की सबसे बड़ी क़ामयाबी थी. उन भाई को मुबारक़बाद!

मुझे कहना होगा कि यह बात सुनकर मुझे जितनी ख़ुशी हुई, उससे ज़्यादा हैरत हुई. क्योंकि मैं तो यह सुनने की उम्मीद कर रहा था कि “अगर क़ुरान में लिखा है तो हम अपने बच्चे की क़ुर्बानी देने से भी पीछे नहीं हटेंगे!” क्योंकि मैं इस क़ौम से पूरी तरह नाउम्मीद हो चुका हूँ.

लेकिन मालूम हुआ कि औलाद का प्यार मज़हबी अंधेपन पर भारी पड़ गया! इसके लिए तालियाँ!

काश कि वो जोधपुर की बच्ची भी इतनी ख़ुशनसीब होती.

वो जोधपुर की अासिफ़ा है, जिससे लिबरलान मोहतरमों को दो पैसे का सरोकार नहीं. सेकुलरिज़्म की मंडी में वो बिकाऊ माल नहीं है और इंटरनेशनल कम्युनिटी से भी अब कोई तज़किरा नहीं आता दिख रहा.

ख़ैर. तो कल उस “इक़बालिया बयान” से एक बहुत ही ज़रूरी चीज़ साफ़ हो गई, और वो ये कि–

“अगर कोई बात क़ुरान में लिखी गई हो तो ज़रूरी नहीं कि उसको माना ही जाए!”

यह एक बहुत बड़ी मनोवैज्ञानिक बाधा उन भाई ने कल लांघ ली!

क़ुर्बानी

सभ्यता का प्रारम्भ तभी होता है, जब मनुष्य कहता है कि इस कथित पवित्र किताब में लिखी बातें मानना मेरे लिए ज़रूरी नहीं है, चाहे काफ़िर कहो, चाहे दोज़ख़ में भेज दो.

अब मैं उन भाई से और उनके जैसे सभी दूसरे भाइयों से इल्तिजा करूंगा कि औलाद पर बात आने पर जब एक शख़्स क़ुरान की नाफ़रमानी पर राज़ी हो सकता है तो अब यह भी जानने की कोशिश करें कि उस किताब में क्या-क्या लिखा गया है, उस लिखे की आज क्या वैधता है, क्या प्रामाणिकता है, वह आज के वक़्त के हिसाब से कितना ज़रूरी है, कितना मौज़ू है, कितना माक़ूल और मुनासिब है, और क्या वाक़ई इंसानियत को उन बातों की आज कोई ज़रूरत है भीे!

मुस्लिमों के साथ दिक्क़त यह है कि जैसे ही उन्हें उनकी बुराइयों के बारे में बताया जाए, वे फ़ौरन “काउंटर अटैक” की मुद्रा में आ जाते हैं. अपनी ग़लतियों का मुज़ाहिरा करने की उनकी क्षमता बहुत कमज़ोर होती है. मैं मुस्लिमों से अनुरोध करूंगा कि दुनिया जहान के हवाले देकर अपनी गर्दनें बचाने की हवस छोड़ो, आँख खोलो, नीयत साफ़ करो, दिमाग़ का इस्तेमाल करो, और सही ग़लत की ज़ाती समझ विकसित करो.

दुनिया यह सब आज से दो-तीन सौ साल पहले ही कर बैठी है. ईसाईयत ने तो सोलहवीं सदी में ही लूथर के नेतृत्व में अपने भीतर सुधार कर लिए थे. “रोमन कैथोलिक” सत्ताओं को चुनौती दी गई, “प्रोटेस्टेंट” रिफ़ॉर्म्स हुए, “चर्च” के वर्चस्व को बेदख़ल किया गया. “प्रबोध” और “संज्ञान” के लिए एक क़ीमत अवाम ने चुकाई, फ़रिश्तों और पैग़म्बरों ने इसमें उनकी कोई मदद नहीं की. उन्नीसवीं सदी में रब्बी गेइगर के नेतृत्व में यहूदियों ने और बांग्ला पुनर्जागरण में हिंदुओं ने अपने भीतर सुधार किए. सती प्रथा समाप्त हुई, बाल विवाह समाप्त हुआ, विधवा विवाह प्रारम्भ हुआ और पशु‍बलि की बर्बर प्रणाली को लगभग निरस्त कर दिया गया.

इस बात को याद रखो कि किताबों में जो अफ़साने लिखे होते हैं, उन्हें हूबहू मानने की ज़रूरत नहीं है. नहीं तो आज हिंदू लोग गीता और महाभारत का हवाला देकर हर जगह धर्मयुद्ध लड़ रहे होते, कि आत्मा तो अमर है, देह तो नश्वर है, इसलिए मारो काटो. लेकिन वो लोग गीता पर भाष्य लिखते हैं और महाभारत पर थिएटर वग़ैरा करते हैं, और तुम एक झूठी मनगढ़ंत कहानी के आधार पर मासूमों के गले रेत रहे हो!

दुनिया जैसे सभ्य बनी है, तुम भी बनो!

अगर एक समीर अहमद आज यह कह सकता है कि “क़ुरान में लिखा हो तो भी नहीं मानेंगे” तो आप लोग ऐसा क्यों नहीं कह सकते?

कोशिश करो. इंसान बनो! इतना मुश्क़िल नहीं है!

सुशोभित सिंह सक्तावत

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